Wednesday, March 7, 2012


 सत्ता है श्रीमान तुम्हारे कब्जे मैं|
किन्तु नहीं अभिमान तुम्हारे कब्जे मैं ||
सामाजिक माहौल प्रदूषित इसीलिये,
रही नहीं संतान तुम्हारे कब्जे मैं ||
धन-दौलत बलवान तुम्हारे कब्जे में|
हो न सका शैतान तुम्हारे कब्जे में ||
सुविधाओं की खान तुम्हारे कब्जे में|
ज्ञान दान सम्मान तुम्हारे कब्जे में||

लोकतंत्र का दौर मगर दिखता अब भी,
सीधा- सा इंसान तुम्हारे कब्जे में |

कहने को तो सब कुछ है परमेश्वर का,
लेकिन है भगवान तुम्हारे कब्जे में |

कविवृन्द करें गुणगान हमेशा प्यारे!,
संविधान ईमान तुम्हारे कब्जे में |

तुम हो विश्व महान ज्ञात है जन मन को,
'तुकाराम' की जान तुम्हारे कब्जे में ||

Monday, March 5, 2012

आधुनिक माहौल में कैसे सुनाये गीत।
राजनेता जा रहे हैं न्याय के विपरीत ।।

लोक ऋषियों की शुमारी आज पगलो में,
श्वेत वस्त्रों से ढके वक राज महलों में।
माफियाओं के सगे वे इसलिए भयभीत।
राजनेता जा रहे हैं न्याय के विपरीत ।।

वे न जानें क्यों चला था देश में चरखा,
लू न झेली जेठ की न पौष की बरखा ।
क्या पता उनको कि कटता किस तरह से शीत?
राजनेता जा रहे हैं न्याय के विपरीत ।।

जो बटोरे जा रहे हैं शक्तियां सारीं,
हैं उन्हीं के शीश जुम्मेदारियां भारीं।
पर अकेले चाटते हैं वे प्रगति नवनीत।
राजनेता जा रहे हैं न्याय के विपरीत ।।

झेलते बनता न उनके शब्द वाणों को,
दीजिये संजीवनी कुछ त्यक्त प्राणों को।
आप ही हारे-थकों के  बंधु हैं मनमीत| 
राजनेता जा रहे हैं न्याय के विपरीत ।।

Sunday, March 4, 2012

इतने उदास क्यों हो जरा मुस्कराइए जनाब?
दृग देख जो रहे हैं उसे गुनगुनाइए जनाब।।
तुझ में परेश में क्या कहीं मानते विभेद लोग,
यदि तू यहाँ न होता वहां वो बताइए जनाब ?
जग में मनुष्य भूखे अभी हैं प्रिये! कई करोड़,
उनकी महानता को कदापि न छिपाइए जनाब।
कितनी ख़राब होगी दशा खूब कीजिये विचार,
फिर एक और रैली विशाल बुलवाइए जनाब।
इतने बड़े बने थे खड़े पारसा समाज बीच,
फिर क्यों न पारसाई जरा-सी दिखाइये जनाब?
हिन्दू मुसलमान बौद्ध ईसाई बहाई सिंख,
पहले स्वतः शरीफ इंसान बन जाइए जनाब।
हँसते हुए 'तुका' के सिवा नफरती विषाक्त घूट,
जिसने पिए उसे तो कंठ से लगाइए जनाब। 
   
 

Saturday, March 3, 2012

जहाँ देखिये हैं वहीँ पर तमाशे ।
करें राजनेता पसर कर तमाशे।।
पता है सभी को किसे क्या बताएं,
बड़ों ने किये हैं उमर भर तमाशे।
जरा सोचिये राजसत्ता किसी ने,
किसी से छिना ली दिखाकर तमाशे।
नसीहत नहीं बात है चेतना की,
बने आजकल ईश के घर तमाशे।
बड़ीं कुर्सियों के लिए हैं कराते,
बड़े आदमीं तो मनोहर तमाशे।
'तुका' कुछ नए दौर से सीखिए भी,
दिखाने लगे आज शायर तमाशे।
  

Friday, March 2, 2012

भूखे-प्यासे चाहते, चावल रोटी दाल।
सत्ताधारी को 'तुका',भये खोटी चाल।।
जहाँ भूख से आदमी,त्याग रहे हों प्राण।
वहां जानिये हैं नहीं,शीलवान इंसान ।।
वर्तमान में हो गए,असफल धर्म प्रयोग।
नहीं भगाये भग रहा,स्वार्थ सिद्धि का रोग।।
एक ओर तन शक्ति है,एक ओर धन शक्ति।
'तुका' धर्म की शक्ति से, श्रेष्ठ शिवं अनुरक्ति।।    

Thursday, March 1, 2012

कवि तथ्य खोजता है|
नित सत्य बोलता है ||
झूठे  फरेबियों को ,
हर वक्त टोकता है |
सहकार के बिना तो,
संभव न एकता है |
टूटे हुए दिलों को ,
साहित्य जोड़ता है|
जिसको सलीब दे दी,
उसकी न कुछ खता है|
हालात की हवा से ,
मुरझा गई लाता है |
वह काव्य  'तुका' जो ,
परमार्थ सोचता है |



अंधकार है अभी अभी निघात घात है।
ज्ञान के प्रकाश का कहाँ हुआ प्रभात है?
स्नेह सभ्यता वहां प्रभाव क्या दिखा सके,
स्वार्थ सिद्धि के लिए जहाँ अशेष रात है।
चेतना प्रबोध का अभाव क्यों न हो वहां,
अर्थ तंत्र का जहाँ बलात बज्रपात है ।
कौन जानता नहीं अभद्र राजनीति के,
सामने अकल्क की कहाँ बची बिसात है ?
मान्यता सदा उसे कबीर भाँती दीजिये,
काव्य-धर्म की जिसे पुनीत प्रीत ज्ञात है।
पंचशील के हरे-भरे विशाल बाग़ में,
साठ साल बाद भी खिला न पारिजात है।
लोकराज्य जानता परन्तु मौन हैं सभी,
ध्वंस के कगार पर खड़ा मनुष्य स्यात है।
लोग तो स्वतंत्र हैं परन्तु मुक्त रूप से,
हो रही कहीं नहीं तुका स्वतंत्र बात है ।