Thursday, April 12, 2012

चलो देखें ठिकाने वे जहाँ पर तोपखाने हैं|
ठगों के कारनामों के इरादे आजमाने हैं||

गरीबी जी रहे,दिल में अमीरी के खज़ाने हैं,
पड़े हैं कैद में फिर भी जुबां ऊपर तराने हैं|

मुहब्बत है जमाने से मुहब्बत से कभी कोई,
बुलाता है चले जाते नहीं करते बहाने हैं|

किसी भी हाल में प्यारे! मिटाने से नहीं मिटते,
हमारे आपके रिश्ते कई सदियों पुराने हैं|

सियासत के दरिन्दों ने हमेशा आग बरसायी,
मगर कवि ने किये जो वायदे वे भी निभाने हैं|

जिन्हें अब तक नहीं इंसान की पहचान हो पाई,
उन्हें इंसानियत वर्धक पहाड़े भी पढ़ाने हैं |

किसी की चौधराहट से 'तुका'भयभीत क्या होना,
भले इंसान को भी तो बहुत से आशियाने हैं|
शब्दों का कैसे कहाँ,करना है उपयोग|
साहित्यक व्यवहार को,तुका सिखाते लोग||

Wednesday, April 4, 2012

नौकरी के बोझ ने इतना दबाया है|
न्याय का अक्षर कभी मुँह पर न आया है||

क्यों उसे विश्वास काबिल लोग मानेंगे,
एक पल जिसने न खुद को आजमाया है?

लोग अपने आपको जो संत कहते हैं,
क्या उन्होंने संत-सा जीवन बिताया  है?

वक्त ने साहस दिखाया प्रश्न यों पूछा ,
स्याह धन कितना कहाँ किसने छिपाया है?

वो भला अपराध से क्यों हाथ धोयेगा,
पा रहा जो राजनैतिक छत्रछाया है?

कौन कर सकता उसे साहित्य से खारिज,
धर्म कविता का 'तुका' जिसने निभाया है?
ठिकाने रौशनी वाले हमेशा खोजता रहता|
तुम्हारी नींद खुल जाये प्रबोधन सोचता रहता||

हमारी लेखनी लिखती जहाँ की उस कहानी को,
जिसे भूखा जिया करता कमेरा बोलता रहता|

भलाई के इरादों में छिपी शैतानियत जो है ,
उसे बेख़ौफ़ होकर कवि निरंतर टोकता रहता|

प्रदूषण हर तरह का फैलता ही जा रहे देखो,
इसी कारण नये पौधे जमीं पर रोपता रहता|

किसे मालूम हैं उनमें कभी इंसानियत जागे,
ठगी में लिप्त जो हैं वे ह्रदय झकझोरता रहता|

यहाँ विध्वंस करने के विविध संचार तंत्रों को,
मिटाने हेतु साहित्यक स्वरों को जोड़ता रहता|

जरा -सी शक्ति पा जायें थके-हारे जमाने में, 
इसी कारण 'तुका' अविरल पवन-सा डोलता रहता|

Tuesday, April 3, 2012

लिखे गीत परमार्थ ग़ज़लें कहीं हैं|
मुहब्बत लुटायी व्यथायें सहीं हैं ||

नहीं हैं अलौकिक कहीं भी ठिकाने,
सुलभ ज़िन्दगी हेतु खुशियाँ यहीं हैं|

कहीं और जाना नहीं आदमी को,
यहीं प्यार की बारिशें हो रहीं हैं |

उन्हें बाँट सकता न कोई कहीं भी,
जिन्होंने सदाचार राहें गहीं हैं |

उन्हें शान्ति सुख-चैन कैसे मिलेगा,
जिन्होंने कि नोटों की गड्डी तहीं हैं|

कुकर्मों सहित स्याह धन के तुम्हारी,
लिखीं जा रहीं सुर्ख खाता वहीँ हैं|

'तुका' ज़िन्दगी मुश्किलों की कहानी,
बताओं कहाँ वेदनायें नहीं हैं ?

Monday, April 2, 2012

व्यथित कभी करते नहीं,हमें पश्चिमी रोग|
सत्य-ज्ञान के मूल हैं,हम भारत के लोग ||

कर्म हमारा धर्म है,मर्म शील सहयोग |
जियें तपस्वी ज़िन्दगी,हम भारत के लोग||

सर्वोदयी विकास के, नये-नये उद्द्योग|
नित्य लगाते आ रहे,हम भारत के लोग||

जीवन मूल्य पर्राथ हैं,भले लगें न भोग|
त्याग भावना से भरे,हम भारत के लोग||

चलना अपनी ज़िन्दगी,फलना बढ़ना योग|
नदियों वृक्षों भांति हैं,हम भारत के लोग||

साम्य भाव से जी रहे,प्रिय! संयोग-वियोग|
शत्रु भावना से परे , हम भारत के लोग ||

भलीभांति हैं जानते,माटी का उपयोग |
तर्क-ज्ञान के मीत हैं,हम भारत के लोग||

Sunday, April 1, 2012

ज़िन्दगी को सजाने चले|
शोर क्यों फिर मचाने चले?


शूल ही, शूल हैं राह में,
साथ में मुस्कराने चले|


वक्त की चाल पहचानिये,
क्यों मुसीबत उठाने चले?


आदमीयत यहाँ रो रही,
आप हँसने-हँसाने चले|


भौतिकी अर्थ के दौर में,
बोझ किसका उठाने चले?


प्राण-पोषक पवन की तुका,
गंध पावन बहाने चले|