Thursday, January 10, 2013

एक गीत:-

प्रश्न पुराने उठा-उठाकर ,बहस कराते हैं|
आग लगाकर चतुराई से, वोट जुटाते हैं||

मीठी बातें करें कहीं पर,कहीं गरल उगलें,
आसमान में दौड़ लगायें,धरती पर फिसलें,
ऐसे रूढिग्रस्त सामंती,कलुष उपायों से-
भोले-भाले युवकों को बेहद बहकाते हैं|
आग लगाकर चतुराई से वोट जुटाते हैं||

छीना-झपटी लूट-पाटकर,आतप-सा पसरे,
कहने में अति कुशल मगर वे सुनने में बहरे,
बच्चा-बच्चा बोल रहा है चोर डकैत छली-
जाति-धर्म के बल पर सत्ता को हथियाते हैं|
आग लगाकर चतुराई से वोट जुटाते हैं||

मेरे-तेरे के घेरे में,खड़े-खड़े अकड़े,
स्वार्थ साँकलों से ठगुओं के हाथ-पैर जकड़े,
सागर पीकर भी बुझ पाई,प्यास नहीं जिनकी-
मरुस्थलों में वही दूध की नदी बहाते हैं|
आग लगाकर चतुराई से वोट जुटाते हैं||

Tuesday, January 8, 2013


पड़ा मुखों पर क्यों ताला?

गली-गली में दहक रही है अनय जलाने को ज्वाला| 
आयातित भौतिक वैभव का पड़ा मुखों पर क्यों ताला?

लगता है अब सज्जन हारे,नायक ने हैं हाथ पसारे,
ज्ञानदानियों ने शिक्षा के,बंद कर दिये हैं सब द्वारे |
जनप्रतिनिधि दलप्रतिनिधि बनके लगे बदलने हैं पाला| 
आयातित भौतिक वैभव का पड़ा मुखों पर क्यों ताला?

त्यागो कभी न नैतिक दावा,आज समय है बोलो धावा,
किसको पता कि कब आ जाये,बिना बताये वक्त बुलावा|
मिलकर शीघ्र हटाना ही है,लगा कलंकित धब्बा काला|
आयातित भौतिक वैभव का पड़ा मुखों पर क्यों ताला?| 

डरने वाले तो डरते हैं,पर करने वाले करते हैं,
नदियों को अविरल नीर मिले,पर्वत से झरने झरते हैं|
जयघोष लगाती विजय खड़ी,लायी है जयवंती माला||
आयातित भौतिक वैभव का पड़ा मुखों पर क्यों ताला?

Monday, January 7, 2013


काव्य-प्रभा गिरते मूल्यों के,फिरसे चमन खिला देगी|
शब्द- साधना की रस धारा, मरते प्राण जिला देगी ||

अपने से जो बचे उसे तो, खुले हाथ देते रहना ,
सुलभ न जिनको भोजन-पानी,उनकी सुधि लेते रहना|
स्नेह भावना थके हुओं को,कर्मठ शक्ति दिला देगी |
शब्द- साधना की रस धारा, मरते प्राण जिला देगी ||

जो सबका स्वागत करता हो,उस पथ के ऊपर चलना,
मधुर फलों के तरुओं जैसा जगहित दुख सहकर फलना|
त्यागवृत्ति अमरत्व बोध का,मधु पीयूष पिला देगी |
शब्द- साधना की रस धारा, मरते प्राण जिला देगी ||

सुमनों हेतु न चाहत रखना,शूलों को सिचित करना,
जीवनदायक प्राणवायु की भाँति व्यथा चलकर हरना|
प्रीति रीति अरि अभ्यंतर के दूषित अचल हिला देगी|
शब्द- साधना की रस धारा, मरते प्राण जिला देगी ||

Sunday, January 6, 2013

एक कवि-कर्म आधारित राष्ट्रीय गीत:-

राष्ट्र -रक्षकों ने स्वदेश के,राजकोष को लूटा है|
अब ऐसा आभास हो रहा,कुम्भ धैर्य का फूटा है||

अधिकारों ने की मनचाही,कहीं उगाही कहीं तबाही,
लापरवाही भरी व्यवस्था,न्याय हितैषी दिखें न राही|
कदचारियों के प्रभुत्व से, संयम -संबल टूटा है | 
अब ऐसा आभास हो रहा,कुम्भ धैर्य का फूटा है||

युगबोधक कबीर-सा गायें,जनमानस भयहीन बनायें,
विप्लववादी संगठनों से, जूझ रहे इन्सान बचायें|
बगुला-भक्तों की प्रवृत्ति से,दूषण भोग न छूटा है|
अब ऐसा आभास हो रहा,कुम्भ धैर्य का फूटा है|| 

समझें नव पीढ़ी की वाणी,विलख रहे हैं व्याकुल प्राणी,
विषम परिस्थिति से उबारती,सदा रही कविता कल्याणी|
हर हालत में मित्र बचाना,भारत भवन अनूठा है|
अब ऐसा आभास हो रहा,कुम्भ धैर्य का फूटा है||

Saturday, December 22, 2012

शायद नयी नजीर से तकलीफ़ हो रही,
बढ़ती हुई लकीर से तकलीफ़ हो रही |

शोषित गरीब वर्ग को दो रोटियाँ मिलीं,
कितनी यहाँ अमीर को तकलीफ़ हो रही|

जब से समाज में दबी आवाज़ उठ रही,
तब से सुना बजीर को तकलीफ़ हो रही|

पर पीर से जिन्हें नहीं किंचत लगाव है,
उनको अधीर पीर से तकलीफ़ हो रही |

जो लोग चाहते ठगी जड़ता बनी रहे,
उनको तुका कबीर से तकलीफ़ हो रही|  

Wednesday, December 19, 2012


कुछ लोग मुहब्बत के घर में नफ़रत की बातें करते हैं,
कुछ नफ़रत सहते हँसकर के चाहत की बातें करते हैं|

खल नायक तो व्यवहार हीन आदत की बातें करते हैं, 
जिसकी न इबारत पढ़ सकते उस खत की बातें करते हैं|

इस दुनिया का दस्तूर यही थोड़ा-सा अर्थ चढ़ा करके,
हर भाँति अनधिकृत पाने को मिन्नत की बातें करते हैं|

उन लोगो को सम्मान लाभ यूँ ही मिलता रहता है जो,
सत्ता की चौखट छूने को कसरत की बाते करते हैं|

ये दौर न जाने कैसा है किस ओर और अब भाग रहा, 
जो लूट रहे पर इज्जत वे इज्जत की बातें करते हैं|

उनके लेखन को मान ‘तुका’ किस भाँति दिया जा सकता जो,
साहित्यकार बनते हैं पर दौलत की बातें करते हैं|

Wednesday, December 12, 2012

तन की सुंदरता अच्छी है,मन भी सुन्दर कर लें|
अगर हो सके स्नेह-सिंधु में,गहरा और उतर लें||

कभी-कभी नफ़रत की वाणी, अधरों पर आ जाती,
चमक-दमक दौलत की प्रायः,नैनों पर छा जाती|
निष्पृह हो परमार्थ स्वरों से, अपने अंतर भर लें|
अगर हो सके स्नेह-सिंधु में,गहरा और उतर लें||

बनी बनायी राहें जग में,जन अक्सर अपनाते,

कवि गण तो जीवन मंजिल के, मार्ग नवीन बनाते|
जीवन के उलझे प्रश्नों का, स्वतः खोज उत्तर लें|
अगर हो सके स्नेह-सिंधु में,गहरा और उतर लें|| 

बिना प्रयोजन समय बिताना,कवि का धर्म नहीं है,
भलीभाँति यह सत्य समझ लें, सच्चा स्वर्ग यहीं है | 
अपने सुख की करें न चिंता,औरों के दुख हर लें |
अगर हो सके स्नेह-सिंधु में,गहरा और उतर लें||

यहाँ दूसरों के हित जिसने, मर मिटना जाना है,
उसको युग ने मुक्त भाव से, संतों- सा माना है|
उपेक्षितों की गलियों में भी,थोड़ा-बहुत विचर लें|
अगर हो सके स्नेह-सिंधु में,गहरा और उतर लें||