Saturday, January 19, 2013

मुफ़्त के माल की ओर तकता नहीं,
डालरों की तरफ भी लपकता नहीं|

चाह है घूमने की सकल विश्व में,
और बीजा कभी माँग सकता नहीं|

मुक्त अखबार हूँ ख़ूब पढ़ लीजिए,
क्षेपकों से कभी तथ्य ढकता नहीं|

सर्जना के लिए शक्ति देता वही,
धूप में स्वेद-श्रम जो टपकता नहीं|

सत्य अनुभूतियों को सुनाते हुए,
मंचपर कवि लटकता मटकता नहीं|

लाख लालच रहें पर उन्हें देख के,
संत परमार्थ पथ से बहकता नहीं|

सृष्टि को जीवनी शक्ति देके 'तुका',
प्राणपोषक पवन-पैर थकता नहीं |

Friday, January 18, 2013



अदब के शहर में ग़ज़ब ही ग़ज़ब है|
कहीं रक्त के पान की अब तलब है|
गई शाम जो कल सलामत सिखा के,
उसी की सुबह का नज़ारा अजब है|
हमारे घरों का अमन लूटने को,
कदाचारियों ने लगाई नकब है|
इधर से उधर जो बहाया गया  वो ,
लहू है किसी का न समझो कलब है|
अगर रक्त ही रक्त को पी रहा तो,
जरा सोचिये कौन इसका सबब है?
उसे तो किसी रूप में देखना क्या ,
रहा जो सदा से स्वतः ही सरब है|
पराया समझता तुका जो किसी को,
समझ लो नहीं मजहबी वो हसब है|

Saturday, January 12, 2013

आँसुओं को न बाहर निकलने दिया|
वेदना को ह्रदय बीच पलने दिया ||

मौसमों के चुभे तीर पत्थर सहे,
चित्त परमार्थ तरुभांति फलने दिया|

स्नेह सरिता प्रवाहित रहे इसलिए,
बर्फ की भांति उर नित्य गलने दिया|

कीच के बीच से कल निकाला जिसे,
सत्य पथ पर उसी ने न चलने दिया|

इन दृगों में जलन आग जैसी 'तुका',
पर इन्हें दीप-सा नित्य जलने दिया

Thursday, January 10, 2013

एक गीत:-

प्रश्न पुराने उठा-उठाकर ,बहस कराते हैं|
आग लगाकर चतुराई से, वोट जुटाते हैं||

मीठी बातें करें कहीं पर,कहीं गरल उगलें,
आसमान में दौड़ लगायें,धरती पर फिसलें,
ऐसे रूढिग्रस्त सामंती,कलुष उपायों से-
भोले-भाले युवकों को बेहद बहकाते हैं|
आग लगाकर चतुराई से वोट जुटाते हैं||

छीना-झपटी लूट-पाटकर,आतप-सा पसरे,
कहने में अति कुशल मगर वे सुनने में बहरे,
बच्चा-बच्चा बोल रहा है चोर डकैत छली-
जाति-धर्म के बल पर सत्ता को हथियाते हैं|
आग लगाकर चतुराई से वोट जुटाते हैं||

मेरे-तेरे के घेरे में,खड़े-खड़े अकड़े,
स्वार्थ साँकलों से ठगुओं के हाथ-पैर जकड़े,
सागर पीकर भी बुझ पाई,प्यास नहीं जिनकी-
मरुस्थलों में वही दूध की नदी बहाते हैं|
आग लगाकर चतुराई से वोट जुटाते हैं||

Tuesday, January 8, 2013


पड़ा मुखों पर क्यों ताला?

गली-गली में दहक रही है अनय जलाने को ज्वाला| 
आयातित भौतिक वैभव का पड़ा मुखों पर क्यों ताला?

लगता है अब सज्जन हारे,नायक ने हैं हाथ पसारे,
ज्ञानदानियों ने शिक्षा के,बंद कर दिये हैं सब द्वारे |
जनप्रतिनिधि दलप्रतिनिधि बनके लगे बदलने हैं पाला| 
आयातित भौतिक वैभव का पड़ा मुखों पर क्यों ताला?

त्यागो कभी न नैतिक दावा,आज समय है बोलो धावा,
किसको पता कि कब आ जाये,बिना बताये वक्त बुलावा|
मिलकर शीघ्र हटाना ही है,लगा कलंकित धब्बा काला|
आयातित भौतिक वैभव का पड़ा मुखों पर क्यों ताला?| 

डरने वाले तो डरते हैं,पर करने वाले करते हैं,
नदियों को अविरल नीर मिले,पर्वत से झरने झरते हैं|
जयघोष लगाती विजय खड़ी,लायी है जयवंती माला||
आयातित भौतिक वैभव का पड़ा मुखों पर क्यों ताला?

Monday, January 7, 2013


काव्य-प्रभा गिरते मूल्यों के,फिरसे चमन खिला देगी|
शब्द- साधना की रस धारा, मरते प्राण जिला देगी ||

अपने से जो बचे उसे तो, खुले हाथ देते रहना ,
सुलभ न जिनको भोजन-पानी,उनकी सुधि लेते रहना|
स्नेह भावना थके हुओं को,कर्मठ शक्ति दिला देगी |
शब्द- साधना की रस धारा, मरते प्राण जिला देगी ||

जो सबका स्वागत करता हो,उस पथ के ऊपर चलना,
मधुर फलों के तरुओं जैसा जगहित दुख सहकर फलना|
त्यागवृत्ति अमरत्व बोध का,मधु पीयूष पिला देगी |
शब्द- साधना की रस धारा, मरते प्राण जिला देगी ||

सुमनों हेतु न चाहत रखना,शूलों को सिचित करना,
जीवनदायक प्राणवायु की भाँति व्यथा चलकर हरना|
प्रीति रीति अरि अभ्यंतर के दूषित अचल हिला देगी|
शब्द- साधना की रस धारा, मरते प्राण जिला देगी ||

Sunday, January 6, 2013

एक कवि-कर्म आधारित राष्ट्रीय गीत:-

राष्ट्र -रक्षकों ने स्वदेश के,राजकोष को लूटा है|
अब ऐसा आभास हो रहा,कुम्भ धैर्य का फूटा है||

अधिकारों ने की मनचाही,कहीं उगाही कहीं तबाही,
लापरवाही भरी व्यवस्था,न्याय हितैषी दिखें न राही|
कदचारियों के प्रभुत्व से, संयम -संबल टूटा है | 
अब ऐसा आभास हो रहा,कुम्भ धैर्य का फूटा है||

युगबोधक कबीर-सा गायें,जनमानस भयहीन बनायें,
विप्लववादी संगठनों से, जूझ रहे इन्सान बचायें|
बगुला-भक्तों की प्रवृत्ति से,दूषण भोग न छूटा है|
अब ऐसा आभास हो रहा,कुम्भ धैर्य का फूटा है|| 

समझें नव पीढ़ी की वाणी,विलख रहे हैं व्याकुल प्राणी,
विषम परिस्थिति से उबारती,सदा रही कविता कल्याणी|
हर हालत में मित्र बचाना,भारत भवन अनूठा है|
अब ऐसा आभास हो रहा,कुम्भ धैर्य का फूटा है||