Saturday, July 20, 2013

थू-थू, थू-थू



थू-थू, थू-थू है धिक्कार ---

गुंडा-गर्दी अत्याचार ,
राजनीति का यह उपहार|
आम आदमी ठेंगे पर-
वाह-वाह सुनती सरकार||१ 
थू-थू, थू-थू है धिक्कार ---

चौराहों ऊपर मक्कार,
जगह-जगह बैठे गद्दार| 
गिरता कन्याओं का भ्रूण-
ताल-ठोकता है व्यभिचार||२ 
थू-थू, थू-थू है धिक्कार ---

लापरवाही का अधिकार,
क्रूर हुई भोजन की मार|
घोर गरीबी की संतान-
प्राण गँवायें खाये मार||३ 
थू-थू, थू-थू है धिक्कार ---

राष्ट्रभक्ति का शिष्टाचार, 
लूट डकैती भ्रष्टाचार|
पायें सत्ता का सुख भोग-
दुरभिसंधि कर कुछ परिवार||४ 
थू-थू, थू-थू है धिक्कार ---

जातिवादियों का विस्तार,
क्षेत्रवादियों की जयकार|
पूंजीपतियों का सद्धर्म- 
फैलाना काले व्यापार||५ 

कौन यहाँ पर जुम्मेदार?
किनके कन्धों ऊपर भार?
ऐसा लगता आज नागरिक-
छोड़ रहे मौलिक अधिकार||६ 

गाँव संस्कृति बंटाधार,
नगरों में है हाहाकार|
युवक युवतियों की आवाज़- 
इन रोगों का हो उपचार||७ 
थू-थू, थू-थू है धिक्कार ---

मौज मनाओ है इतवार,
अथवा हो जाओ तैयार|
न्याय हितौषी होकर एक 
करें प्रयोग वोट अधिकार||८ 
थू-थू, थू-थू है धिक्कार ---

अनाचारियों का प्रतिकार,
सदाचारिता का संचार|
लोकहितैषी सीधे मार्ग-
अबतो करने हैं स्वीकार||९ 
संविधान के प्रति आभार| 
संविधान के प्रति आभार|

Sunday, July 14, 2013

पंचशील का बाग

किसी क्षेत्र में राष्ट्र प्रेम की, महक न मंदिम पड़ पाये|
मिला स्नेह सहकार वृक्ष जो, जड़ उसकी न उखड़ पाये||

मान रहा हूँ स्वार्थवृत्ति का, रोग निरन्तर फैल रहा|
रोकथाम करने को कब से, हटा मानसिक मैल रहा|
दिया सरहदों ऊपर पहरा, अरिदल अब न उमड़ पाये|
मिला स्नेह सहकार वृक्ष जो, जड़ उसकी न उखड़ पाये||

काव्यशक्ति से नागरिकों को, युग प्रबोध संगीत दिया,
सत्य- असत्य परखने वाला, पारख सूत्र प्रणीत किया|
प्रगतिशील जीवन हों अपने, जड़ता नहीं जकड़ पाये|
मिला स्नेह सहकारवृक्ष जो, जड़ उसकी न उखड़ पाये||

लोकहितैषी उद्योगों को, भलीभाँति विकसित कर लें,
जिन क्षेत्रों में पीछे उनके, कारण अन्वेषित कर लें|
पंचशील का बाग सुहाना, फिरसे नहीं उजड़ पाये|
मिला स्नेह सहकार वृक्ष जो, जड़ उसकी न उखड़ पाये||

विश्व शान्ति के हेतु हमारा, संविधान उद्घोषक है,
बुद्धि विवेक तर्क विज्ञानी, राह चुनी सहयोजक है|
संचित शक्ति करें अब इतनी, कोई कर न पकड़ पाये|
मिला स्नेह सहकार वृक्ष जो, जड़ उसकी न उखड़ पाये||

Friday, July 12, 2013

कहानी हो किसी की

नहीं सम्बन्ध रखते जो भले इन्सान से,
सुनाते कातिलानी भूमिका वे शान से|

ठगों की आदतें जाती नहीं गुणगान से, 
सही पहचान होती है नहीं परिधान से|

कभी सत्ता मिले शायद उन्हें भी देश की,
मिलेंगे लेखकों को तोहफे अनुदान से|

उन्हीं के हाथ से स्वीकार के उपहार को, 
खड़े हरदम रहेंगे साथ में जी जान से|

समझना चाहिये इन्सान को इतना सदा,
भला होता किसी का भी नहीं शैतान से|

इसी में तोष मिलता है यही चाहत रही, 
महज दो रोटियाँ मिलती रहें सम्मान से|

कहानी हो किसी की भी किसी दौरान की,
उसे समझा 'तुका' ने तर्क से विज्ञान से|

Sunday, July 7, 2013

चेतना जाग्रत

चेतना जाग्रत करे जो वो कहानी जानिये|
बैठिये नजदीक आकर जिंदगानी जानिये||

वाहवाही लूटने की शक्तियाँ जिसमें भरी,
सभ्यता संवेदना की काव्यवाणी जानिये|

मानता हूँ वो किसी की वाटिका में कैद है, 
पर महकती जो यहाँ वो रातरानी जानिये|

बंधनी सी अब दिखाई दे रही लेकिन कभी,
लोकशाही भावना मत खानदानी जानिये|

जो सुनी सुनते सुनाते आ रहे हो आदि से, 
वो कथा है सत्य कितनी संत ज्ञानी जानिये? 

यूँ किसी को ज्ञात अगला पल नहीं होता मगर,
शायरों की ज़िन्दगी को गैरफानी जानिये|

भौतिकी विज्ञान के इस दौर में सोचो 'तुका',
क्या सिखाती हैं किताबें आसमानी जानिये?

Saturday, July 6, 2013

रूप हमारे गाँव का

बदल गया है बचपन वाला, रूप हमारे गाँव का|
सूख गया है मृदु जल वाला, कूप हमारे गाँव का||

जटिल कार्य सहकार भाव से, सब कर लेते थे,
जिसका जो हक बनता थे वो, उसको देते थे |
दुनिया भर में जाना जाता, जूप हमारे गाँव का|
बदल गया है बचपन वाला, रूप हमारे गाँव का||

गेहूँ चना मटर की फसलें, यूँ लहराती थी,
जैसे सजी-धजी माँ-बहनें कजरी गाती थी|
कृषकों श्रमिकों-सा रहता था, भूप हमारे गाँव का|
बदल गया है बचपन वाला, रूप हमारे गाँव का||

तीन- तीन तालाब नीर से, पूरित रहते थे,
जिनमें कई बतख जीवन की, महिमा कहते थे|
सहज प्रेरणा स्रोत रहा आनूप हमारे गाँव का|
बदल गया है बचपन वाला, रूप हमारे गाँव का||

युवक युवतियाँ सहोदरों- सा, हँसते गाते थे,
हिलमिलकर के सब नर-नारी, पर्व मनाते थे|
चारों और बहुत चर्चित था, यूप हमारे गाँव का |
बदल गया है बचपन वाला, रूप हमारे गाँव का||

Wednesday, July 3, 2013

राजधानी

नशेबाज-सी सो रही राजधानी,
कदाचार को ढो रही राजधानी| 

डकैती बकैती लठैती प्रभावी,
अनाचार से रो रही राजधानी|

कहीं नीर निर्मल दिखाई न देता, 
वदन कीच से धो रही राजधानी| 

व्यवस्था हुई चम्बली आज देखो,
डवांडोल कुछ हो रही राजधानी|

विषैले फलों को उगाती रहे जो, 
वही बीज तो बो रही राजधानी|

मचा राजनैतिक घमासान ऐसा,
'तुका' धैर्य को खो रही राजधानी|

Monday, July 1, 2013

हाथ में हाथ

हाथ में हाथ सबसे मिलाते नहीं,
शान शौकत हमेशा दिखाते नहीं|

आसमां शीश ऊपर उठाते नहीं|
शक्ति बेकार में तो गँवाते नहीं|

कौन-सा राष्ट्रहित वे करेंगे कहो,
जो सुबह विस्तरा छोड़ पाते नहीं|

हाल बेहाल उनका हुआ क्या कहें,
शिष्य भी आजकल पास जाते नहीं|

मित्र से क्या शिकायत करें वे भला,
शत्रु भी शत्रुता अब निभाते नहीं |

वक्त ने इस तरह से सताया 'तुका'
अश्रु आते नहीं मुस्कराते नहीं|