Monday, August 12, 2013

लोक व्यवस्था

कर्त्तव्यों की बोझिल गठरी लादे घूम रहे,
आज अनोखेलाल गगन के तारे चूम रहे|

लोक व्यवस्था दोनों हाथों देती मान उन्हें,
जो सत्ता की हिस्सेदारी से महरूम रहे|

अध्यापन की गरिमा शोभा देती नहीं उन्हें,
ज्ञान दान करने में जो भी बेहद सूम रहे|

संविधान ने जीवन यापन का अधिकार दिया,
पर किसकी क्या हैं सीमायें यह मालूम रहे|

खींचातानी अफरातफरी होगी क्यों न वहाँ,
भूख-प्यास से व्याकुल रोता जहाँ हुजूम रहे|

हो सकता संभव सामाजिक तब सदभाव 'तुका',
जब नफ़रत फैलाने वाला रंच न धूम रहे|

Friday, August 9, 2013

नगाड़े लोकशाही के

सुनाई दे रहा सुनिये यही तो शोर है,
पसारा गुंडई ने खौफ़ चारों ओर है|

अचानक आ गया बदलाव ये माहौल में,
भयाभय साँप से दिखने लगा अब मोर है|

हवा में चैन की खुशबू अभी फैली नहीं,
हुआ क्या बाकई सुख शान्ति वर्धक भोर है?

उसी को राजनैतिक क्षेत्र में अवसर यहाँ ,
हुआ जो हाथ-पैरों अर्थ से सहजोर है|

नगाड़े लोकशाही के बहुत से गूँजते,
कहो फिर क्यों गरीबों को बनाया ढोर है|

किसी ने भी उसे सम्मान से देखा नहीं,
'तुका' जो आचरण से ही रहा गमखोर है|

Wednesday, August 7, 2013

अनोखेलाल

कर्त्तव्यों की बोझिल गठरी लादे घूम रहे,
आज अनोखेलाल गगन के तारे चूम रहे|

लोक व्यवस्था दोनों हाथों देती मान उन्हें,
जो सत्ता की हिस्सेदारी से महरूम रहे|

अध्यापन की गरिमा शोभा देती उन्हें नहीं,
ज्ञान दान करने में भी जो बेहद सूम रहे|

संविधान ने जीवन यापन का अधिकार दिया,
पर किसकी हैं क्या सीमायें यह मालूम रहे|

खींचातानी अफरातफरी होगी क्यों न वहाँ,
भूख-प्यास से व्याकुल रोता जहाँ हुजूम रहे|

हो सकता संभव सामाजिक तब सदभाव 'तुका',
जब नफ़रत फैलाने वाला रंच न धूम रहे|

Friday, August 2, 2013

चिंतन जल

सुना गया है यहाँ यही तो, बड़े लोग वे होते हैं?
करें नहीं जो सत्कृत्यों को, पड़े चैन से सोते हैं|

सहजोरों के घर वैभवता, कमजोरों को निर्धनता,
राज्य धर्म के दो पाटों में, पिसती रहती है जनता|
इन्हीं कुचालों ने मानव तो, ढोरों जैसे जोते हैं|
सुना गया है यहाँ यही तो, बड़े लोग वे होते हैं?

शोषण के पोषण की गाथा, सदियों छली सुनाये हैं,
बदले में शासन -सत्ता से, दान सुरक्षा पाये हैं|
परजीवी के भारी बोझे, सदा कमेरे ढोते हैं|
सुना गया है यहाँ यही तो, बड़े लोग वे होते हैं?

दुरभिसंधियों के प्रयास को, परमेश्वर से जोड़ा है,
ठगुओं ने भोले-भालों को, नहीं कहीं का छोड़ा है|
पुनर्जन्म के भव सागर में, बंधक खाते गोते हैं|
सुना गया है यहाँ यही तो, बड़े लोग वे होते हैं?

तुम्हें तथागत ने समझाया, फिर क्यों समझ नहीं आता,
परमात्मा आत्मा का कोई, नहीं सत्य से है नाता|
दुख सुख नहीं समझते वे जो, निज विवेक को खोते है| 
सुना गया है यहाँ यही तो, बड़े लोग वे होते हैं?

सदा निवारण हर कारण का, निश्चय जग में होता है ,
वही बुद्ध है जो विपत्ति में, कभी न नैन भिगोता है|
मिलते हैं फल वही कि जिनके, बीज आदमी बोते है|
सुना गया है यहाँ यही तो, बड़े लोग वे होते हैं?

यही उचित है सभी सभी के, सुख-दुख को मिलकर बाँटें,
मानवकृत भेदों को त्यागें, स्नेह सहित जीवन काटें|
श्रेष्ठ संत तो भ्रम की काई, चिंतन जल से धोते हैं|
सुना गया है यहाँ यही तो, बड़े लोग वे होते हैं?

Monday, July 29, 2013

जख्मी आवाज़




बहुत विलखते हुए स्वरों ने, फिरसे उसे पुकारा है|
दुर्दान्तों ने दुखियारी के, तन से चीर उतारा है||

सरेआम कन्या को खींचा, उसे कार से ले भागे,
पता नहीं इन मुस्दंडों के, जुड़े कहाँ से हैं धागे|
गिरते हुए आँसुओं को तो, मिलता नहीं सहारा है|
दुर्दान्तों ने दुखियारी के, तन से चीर उतारा है||

बेमतलब की लफ्फाजी में, सकल प्रशासन खोया है|
यहाँ लग रहा अब यूँ जैसे, संरक्षक ही सोया है||
उद्दंडों के क्रूर कर्म भी, सुनना नहीं गंवारा है|
दुर्दान्तों ने दुखियारी के, तन से चीर उतारा है||

इज्जत जिनकी गई उतारी, उनको बुरा-भला कहते|
दहशतगर्दों की सेवा में, लगे सिपाही कुछ रहते||
न्यायतंत्र ने दौड़ा करके, मरे हुओं को मारा है| 
दुर्दान्तों ने दुखियारी के, तन से चीर उतारा है||

Friday, July 26, 2013

प्यार सद्धर्म है

प्यार सद्धर्म है मूल अधिकार है,
प्यार ने ही रचा भव्य संसार है|

हो सके तो सुदृढ़ से सुदृढ़ कीजिये,
ज़िन्दगी के लिए प्यार आधार है|

भीड़ इस पार है भीड़ उस पार है,
भ्रान्ति के सिंधु में नाँव मझधार है|

लोग जिसको बताते मुसीबत बड़ी,
वो दयावान का श्रेष्ठ उपहार है|

वोट की शक्ति के सामने जानिये,
तीर तलवार क्या तोप बेकार है|

सभ्य संवाद है ज्ञात उसको 'तुका',
मित्र ही क्या जिसे शत्रु स्वीकार है|

Wednesday, July 24, 2013

शाश्वत राग

पतझर ने उजाड़ डाला है, जीवन बाग हमारा|
एकाकी ही गूंज रहा है, शाश्वत राग हमारा||

कालचक्र की इच्छायें तो, हुई न कभी पता,
लेकिन शीत ग्रीष्म वर्षा में, सदा रहा चलता|
अनुभव की आवाज़ हो गया, पावन त्याग हमारा|
एकाकी ही गूंज रहा है, शाश्वत राग हमारा||

जब से होश सँवाला तब से, परहित लगा रहा,
थका तभी सैया पर पहुँचा, फिरभी जगा रहा |
वो भी छीन लिया ठगुओं ने, जो था भाग हमारा|
एकाकी ही गूंज रहा है, शाश्वत राग हमारा||

इसे न समझा बैरी उसको, कभी न मित्र कहा,
समता परक स्वभाव सभी के, लिए पवित्र रहा| 
प्राणवायु सा जगहित बहता, उर अनुराग हमारा|
एकाकी ही गूंज रहा है, शाश्वत राग हमारा||