Monday, December 16, 2013

सफेदी दिखती है लाचार..



राजनीति के गलियारे में, कीचड़ की भरमार,
सफेदी दिखती है लाचार|
सफेदी दिखती है लाचार||

अनुभवहीन व्यक्तियों द्वारा, ऐसा उठा विवाद,
सत्य तथ्य के ऊपर हावी, होने लगा निनाद|
भ्रष्ट दूर करने को निकले, फैला भ्रष्टाचार|
सफेदी दिखती है लाचार|
सफेदी दिखती है लाचार||

असमंजस में खोई जनता, सुने अनैतिक गीत,
सुविधाभोगी लगे समझने, अपने को जगजीत|
स्वार्थवृत्ति के दुरभिसंधि से, होने लगे करार|
सफेदी दिखती है लाचार|
सफेदी दिखती है लाचार||

मजबूरी में दिल्ली छोड़ी, गये गाँव की ओर,
चौथेपन ने तरुणाई को, दिया खूब झकझोर|
जनता फूटी आँखों देखे, परिवर्तित व्यवहार|
सफेदी दिखती है लाचार|
सफेदी दिखती है लाचार||

तुकाराम वर्मा

Saturday, December 14, 2013

दिल्ली की खिल्ली..


राजनीती में घुस बैठे हैं, कई शेखचिल्ली|
उड़ रही दिल्ली की खिल्ली|
उड़ रही दिल्ली की खिल्ली||

लम्बी-चौड़ी बातें करके, इतना भ्रम फैलाया,
मतदाता को मोह तमाशा, समझ नहीं आया|
चूस रही है रक्त पिपासी, सत्ता की किल्ली|
उड़ रही दिल्ली की खिल्ली|
उड़ रही दिल्ली की खिल्ली||

खींच-तान की आन-बान में, शान हुई मैली,
काम नहीं आ रही अर्थ की, अब काली थैली|
चूहों पर है आँख लगाये, ताक रही बिल्ली|
उड़ रही दिल्ली की खिल्ली|
उड़ा रही दिल्ली की खिल्ली|| 

युवाशक्ति ने सत्य वक्त का, कुछ पहचाना है,
कथनी को करनी में पूरा, कर दिखलाना है|
लालचियों के ऊपर रख दी, बर्फीली सिल्ली| 
उड़ रही दिल्ली की खिल्ली|
उड़ रही दिल्ली की खिल्ली||

Wednesday, December 11, 2013

जो कुछ हुआ समाज में

जो कुछ हुआ समाज में वो ठीक हो गया,
इतना पिसा पहाड़ भी बारीक हो ऐसा| 

वह तो गुनाहगार है तस्दीक हो गया,
इस हेतु राजतंत्र के नजदीक हो गया|

क्यों राजनीति में यहाँ विद्रोह-सा मचा,
धनवान आसमान पर आसीन हो गया| 

सद्भावना मिठास की जिसमें असीम थी, 
उस शीत का मिज़ाज भी नमकीन हो गया|

जिसको सुधार के लिए सम्मान था मिला,
वह अर्थ जाप यज्ञ में तल्लीन हो गया|

हिम के समान श्वेत जो पहचान थी कभी,
पहनाव उस फकीर का रंगीन हो गया|

जिसकी महानता तुका बेहद बखान की,
वह ठीक वक्त पर सुना दो तीन हो गया|

Monday, December 2, 2013

बातें करते हैं


कुछ लोग मुहब्बत के घर में नफ़रत की बातें करते हैं,
कुछ नफ़रत सहते है फिरभी चाहत की बातें करते हैं|

वे नायक हैं व्यावहारहीन आदत की बातें करते हैं 
जिसकी न इबारत पढ़ सकते उस खत की बातें करते हैं|

जिनको इंसानी बोध नहीं इंसानों -सा व्यवहार नहीं, 
वे लूट रहे पर इज्जत को इज्जत की बातें करते हैं|

इस दुनिया का दस्तूर यही थोड़ा-सा अर्थ चढ़ा करके,
ईश्वर से अधिक चाहने को मिन्नत की बातें करते हैं|

उन लोगो को सम्मान लाभ जनता से मिलता रहता जो,
नेताओं के घर पर जाकर कसरत की बाते करते हैं|

उनके चिंतन को मान तुका क्यों साहित्यिक जीवन में हो,
जो केवल शोहरत पाने को दौलत की बातें करते हैं|

Friday, November 22, 2013

गीत गाओ मीत

***गीत गाओ मीत***
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भ्रष्टाचारी के विरोध में, ध्वस्त हुआ अभियान,
ठगों ने बहुत किया हैरान|
ठगों ने बहुत किया हैरान||

गाँव गरीब किसान कहाँ हैं? छलियों में गुणवान कहाँ है?
केवल चतुराई की कथनी, बन सकती रहमान कहाँ है? 
कभी करोड़ीमल हो सकते, नहीं आम इन्सान,
ठगों ने बहुत किया हैरान|
ठगों ने बहुत किया हैरान|| 

जिसने जीवन अर्थ न समझा, रहा स्वार्थ में उलझा-उलझा,
उसके कलुष कारनामों से, खिला चमन तक जाता मुरझा| 
जाल- फरेबी ताने- बाने, बुनते है शैतान,
ठगों ने बहुत किया हैरान|
ठगों ने बहुत किया हैरान||

शब्द साधना जो करते हैं, धन से बहुत दूर रहते हैं,
जनता की आवाज़ उठाते, प्राणवायु बनकर बहते हैं| 
कविता नहीं त्याग सकती है, शिवम सत्य ईमान,
ठगों ने बहुत किया हैरान|
ठगों ने बहुत किया हैरान||

मान लिया सत्ता है खोटी, शिखरों ऊपर दाढ़ी- चोटी,
चित्त गंदगी साफ करे जो, उसकी अक्ल हो गई मोटी|
एक -एक तीली झाड़ू की, बिखर गई श्रीमान| 
ठगों ने बहुत किया हैरान|
ठगों ने बहुत किया हैरान||

Saturday, November 16, 2013

हमारी ग़ज़ल

हमारी ग़ज़ल में तुम्हारी अदा है,
सखे देख लो आँख ये नर्मदा है|

गली गाँव में गूँज है कुछ घरों ने,
भरी लूटकर देश की सम्पदा है|

जिन्हें लोग बेबस बताते उन्हीं के, 
सिरों पर भयाभय बोझा लदा है|

फकीरी सिखाती सदाचार सेवा,
अमीरी नहीं मानती कायदा है|

सदा से रहा बोलवाला बड़ों का,
दुखी कीं न सुनता कोई सदा है|

'तुका' सोचिये तो किसी लेखनी से, 
लिखाती गलत क्या कभी शारदा है?

Saturday, November 2, 2013

जीवन गीत:-

जीवन गीत:-

ज्ञान रौशनी देने वाली, दिखती आज निगाह नहीं है|
अर्थतंत्र में फँसी ज़िन्दगी, तर्क विवेकी चाह नहीं है||

अंधकार में दीप जगाना, कभी हमारा चिंतन था,
उच्च सोच थी मानववादी, कहीं न झूठा बंधन था|
आज स्वतंत्र लोकशाही है, लोक समर्थक राह नहीं है|
अर्थतंत्र में फँसी ज़िन्दगी, तर्क विवेकी चाह नहीं है||

शिक्षा ऊपर ताले डाले, हर प्रकार अज्ञान बढ़ा, 
जो परार्थ जीते-मरते थे, उनपर स्वार्थी रंग चढ़ा| 
लालच के सागर की पायी, खोजी ने भी थाह नहीं है|
अर्थतंत्र में फँसी ज़िन्दगी, तर्क विवेकी चाह नहीं है||

आपस में छीना-झपटी का, दौर चलाया मनमाना,
देता है इतिहास गवाही, हुआ सहोदर अनजाना|
अपने और परायेपन को, भाती उचित सलाह नहीं है| 
अर्थतंत्र में फँसी ज़िन्दगी, तर्क विवेकी चाह नहीं है||

यह छोटी सी बात समझना, सबके लिए जरूरी है|
प्रगति पगों के आगे ठहरी, कभी नहीं मजबूरी है||
जीवन गीत नहीं वो जिसमें, होता मुक्त प्रवाह नहीं है| 
अर्थतंत्र में फँसी ज़िन्दगी, तर्क विवेकी चाह नहीं है||