Sunday, April 13, 2014

क्रूरता पर चोट


क्रूरता पर चोट करना हो गया मुश्किल,
क्योंकि अब अपराधियों का बोलवाला हँ|
नफरती दुर्गन्ध फैली, सोच बेहद है विषैली, 
संत की चादर यहाँ तो, हो रही है खूब मैली|
धन उगाने में जुटे हैं आधुनिक नेता,
क्योंकि अब व्यापारियों का बोलवाला है|
सज्जनों को घर निकाला, अंकुरों को नोच डाला,
चिंतकों की बुद्धि पर तो, पड़ गया है अर्थ ताला| 
अब पिपासे रक्त के हर मोड़ पर बैठे, 
क्योंकि अब आतंकियों का बोलवाला है|
सभ्यता से रिक्त भाषा, घोर छाई है निराशा, 
गाँव गलियों बीच नगरों, जाति-वर्गों का तमाशा 
अभिनयी सूरत बनाये राष्ट्र अधिकारी,
क्योंकि अब वैशाखियों का बोलवाला है|

दिल्ली दिखे न दूर

लोकतंत्रीय इस आँगन के, बदल रहे दस्तूर,
पसरने लगा प्रेम का नूर|
पसरने लगा प्रेम का नूर||

कल तक नाम नहीं लेते थे, जो बाबा तेरा,
वे हम सबके के यहाँ जमाने, लगे आज डेरा|
संविधान के आगे उनका, दर्प हुआ काफूर,
पसरने लगा प्रेम का नूर|
पसरने लगा प्रेम का नूर|| 

लूटतन्त्र के गोरखधंधे, जड़ता पाखण्डी,
छोड़ रहे हथियार द्वेष के, शोषक उद्दंडी| 
वोट शक्ति ने कर डाला है, छल-बल चकनाचूर, 
पसरने लगा प्रेम का नूर|
पसरने लगा प्रेम का नूर|| 

खोल दिये प्रेरक दरवाजे, शिक्षा ने सारे,
मुश्किल नहीं तोड़ने लगते, अब नभ के तारे|
सहज संघठन संघर्षों से, दिल्ली दिखे न दूर,
पसरने लगा प्रेम का नूर|
पसरने लगा प्रेम का नूर||

Wednesday, April 9, 2014

सौहार्द वाटिका

पग-पग पर जो किये जा रहा, जन-मन का अपमान, 
उसे अब कहिये तो शैतान| 
उसे अब कहिये तो शैतान||

मानव मूल्यों का हत्यारा, छल बलियों का बना दुलारा,
शील विनय करुणा के घर में, बैर-भाव का रोग उभारा|
जिसके भय से मौन हो गये, बड़े-बड़े विद्वान,
उसे अब कहिये तो शैतान| 
उसे अब कहिये तो शैतान|| 

जेठ धूप जैसा वह फैला, दल-दल में छितराये मैला,
बाजारों ने काले धन का, उसके लिए उड़ेला थैला|
स्वार्थ शक्तियाँ चला रही हैं, जिसका छल अभियान, 
उसे अब कहिये तो शैतान| 
उसे अब कहिये तो शैतान||

चिंतन में हैं खींचातानी, करता रहता है मनमानी,
लोकतंत्र के ऊपर हँसता, नहीं आचरण है इन्सानी|
चाह रहा सौहार्द वाटिका, जो करना वीरान, 
उसे अब कहिये तो शैतान| 
उसे अब कहिये तो शैतान||

Thursday, April 3, 2014

तय करो

युग प्रबंधन डोर हो तुम, 
प्रिय नहीं कमजोर हो तुम, 
यह समय अब पूछता है.. 
तय करो किस ओर हो तुम|

इस तरफ तो है कमेरे, 
उस तरफ लाखों लुटेरे,
नफरतों की आग फैली, 
खुद बचाने हैं बसेरे|
तय करो किस ओर हो तुम|

छल वहाँ हैं बल वहाँ है,
दल-दली कौशल वहाँ है,
नय समर्थक शील प्रेमी-
आचरण उज्ज्वल यहाँ है| 
तय करो किस ओर हो तुम|

Tuesday, March 25, 2014

चिंतन ओध

"**चिंतन ओध**"
लोकतन्त्र का उनके उर में, नहीं पनपता बोध,
सहन जो करते नहीं विरोध|
सहन जो करते नहीं विरोध||

राजनीति के विविध विरोधी, सहयोगी होते हैं,
तर्क विवेकी स्वच्छ नीर से, बैर मैल धोते हैं|
नव विकास के हेतु न चाहें, वे संवर्धन शोध,
सहन जो करते नहीं विरोध|
सहन जो करते नहीं विरोध|| 

एक जगह पर रूक जाने को, जड़ता माना जाता,
बीज न जो सड़ता गलत है, वो न पुनः उग पाता|
नवपरिवर्तन कभी न लाता, उनका चिंतन ओध,
सहन जो करते नहीं विरोध|
सहन जो करते नहीं विरोध||

जनसेवा के लिए सँभालें, जो भी शासन सत्ता,
उनके साथ राष्ट्र उपवन का, हँसता पत्ता-पत्ता| 
प्रायः न्याय नीतियाँ तज के, भग जाते वे योध,
सहन जो करते नहीं विरोध|
सहन जो करते नहीं विरोध||

Monday, March 10, 2014

कवि जीवन तो..



कवि जीवन तो वक्त विवेचक स्नेहाकर्षण है,
सब कुछ साफ दिखाई देता उज्ज्वल दर्पण है|

संग ह्रदय से स्नेह सलिल की धार फूट पड़ती,
जब नयनों में करुण भाव का रहता तर्पण है|

बिगड़े हुए कार्य बन जाते, वहाँ न रिपु रहते,
जहाँ प्यार से रहा प्यार के लिए समर्पण है|

वह उत्तम विचार का उतना बन सकता दानी-
तर्क- कसौटी पर जो करता जितना घर्षण है|

परपीड़ा से पीड़ित जब उर करुणामय होता,
तब कर सकता भाव सुधा से भरा प्रवर्षण है|

कह सकते कवि उसे तुका जो निष्पृह अंतर से,
कर देता परमार्थ स्वतः ही तन मन अर्पण है|

Friday, March 7, 2014

उज्ज्वल तन की ह्रदय मलिनता

राजनीति में छिपी कुटिलता दुनिया ने देखी|
उज्ज्वल तन की ह्रदय मलिनता दुनिया ने देखी||

जोड़- गाँठ से बड़ी कुर्सियाँ जो छीने उनकी,
गाँव-नगर में व्याप्त पतितता दुनिया ने देखी|

शक्तिवान को और और जो दुर्बल को मिलती,
न्याय-नीति में वही विविधता दुनिया ने देखी|

संत भाँति बेदाग़ लबादे जो लादें उनकी,
चतुराई से जनित अधमता दुनिया ने देखी|

हाड़ तोड़ श्रम करें 'तुका' जो तरसें रोटी को ,
उन आँखों में भरी सलिलता दुनिया ने देखी |