सच्चाई
की कमी दिख रही, राजनीति की गलियों में|
किस
शुचिता की खोज रही, ठगुओं में भुजबलियों में?
भूखे-
प्यासे बेवश लाखों, विपदाओं के मारे हैं,
शिक्षा- दीक्षा के नारे तो, आसमान के तारे हैं|
गरल छिड़कने लगे दरिन्दे, वन उपवन की कलियों में|
किस शुचिता की खोज रही, ठगुओं में भुजबलियों में?
काली
करतूतों को ढँकते, कितने वस्त्र
निराले हैं,
जितने
उज्ज्वल तन से दिखते, उतने मन के काले हैं|
अन्तर
नहीं परखना चाहें, छलियों में मखमलियों में|
किस
शुचिता की खोज रही, ठगुओं में भुजबलियों में?
पाले- पोषे ख़ूब जा रहे, जाति- धर्म के आतंकी,
सम्मानित हो रहे सहस्रों, अर्थ समर्थक ढोलंकी|
दूध पी रहे विविध सपोले, स्वर्ण रजत की डलियों
में|
किस शुचिता की खोज रही, ठगुओं में भुजबलियों
में