Tuesday, August 4, 2020

सिर्फ़ रेत ऊपर दिखें

जो सत्ता रहती नहीं, नागरिकों के साथ।
सिर्फ़ रेत ऊपर दिखें, उनके सर्जित पाथ।।
कई करोड़ों वर्ष की, दुनियावी तारीख़।
कितनों पाये सोचिये, सच्चाई से सीख?
इंसानी इतिहास तो,नहीं कहे इतिहास।
शैतानों की क्रूरता, दर्ज अनय संत्रास।।
जो पसारते प्रेम से, न्याय विवेक विधान।
उन्हें मिटाने के लिए, हथियारों की शान।।
सर्जनात्मक है नहीं, सहजोरी की शक्ति।
अपनेपन की गोद में,पलती है अनुरक्ति।।
हम तो एक फ़क़ीर हैं, ज्ञात रही पर पीर।
अंकित की सन्सार के, उर ऊपर तहरीर।।
होता आया होएगा, निश्चय ही बदलाव।
काव्य कर्म का मर्म है, उपजना सद्भाव।।

Monday, August 3, 2020

सच्चाई से


अगर आपको सच्चाई से, करना मेल-मिलाप,
झेलना सीखो कुछ सन्ताप|
झेलना सीखो कुछ सन्ताप||
गुणी नहीं थे उनके जैसे, पर सुकरात जिये थे कैसे,
गलीलियों के जीवन हन्ता, अति मूरख थे ऐसे-वैसे|
सत्ता की काली करतूतें, सब तो कहें न पाप,
झेलना सीखो कुछ सन्ताप|
झेलना सीखो कुछ सन्ताप||
शिव ने पिया गरल जब सारा, बही प्रेम की तब शुचि धारा,
प्रकृति प्रदत्त नियम ये समझो, नहीं प्रकाश तिमिर से हारा|
युग प्रबोधकों की होती है, सबसे न्यारी छाप,
झेलना सीखो कुछ सन्ताप|
झेलना सीखो कुछ सन्ताप||
सन्त कबीरा ने सब खोया, मीरा, शैली, फैज न रोया,
चेतनता जाग्रत जो करता, वह जीवन में रंच न सोया|
सच्चाई को सिवा सत्य के, कौन सका है माप?
झेलना सीखो कुछ सन्ताप|
झेलना सीखो कुछ सन्ताप||

Sunday, August 2, 2020

अमीरी

**************एक गीत ***************
सामन्ती आधार बढ़ा है, पिटने लगे गरीब|
अमीरी दिखलाये तहजीब||
अमीरी दिखलाये तहजीब|||
केवल बहकाबे की बातें, आश्वासन पोषक बरसातें|
चाटुकार मदहोश हुये जो, करें निहत्थों ऊपर घातें||
ठग्गू दादा सिखलाते हैं, ठगने की तरकीब|
अमीरी दिखलाये तहजीब||
अमीरी दिखलाये तहजीब|||
धार्मिक आडम्बर फैलाना, छल से दंगों में उलझाना|
अभिनय रूपी हथियारों से, भ्रामक वातावरण बनाना||
हस्त लकीरों से बनते हैं, उज्ज्वल नहीं नसीब|
अमीरी दिखलाये तहजीब||
अमीरी दिखलाये तहजीब|||
बड़ी गूढ़ शासन की भाषा, स्वार्थसिद्धि प्रेरक अभिलाषा|
गिरगिट -सा जो रंग बनाये, वही प्रशासन की परिभाषा||
सज्जन संत स्वार्थ सत्ता के, रहते नहीं करीब|
अमीरी दिखलाये तहजीब||
अमीरी दिखलाये तहजीब|||
अपनों में भी अपने होते, आम लोग बस बोझे ढोते|
खास माल खाते- पीते हैं, नारे बाज अनवरत रोते||
झूठों को मिलती है सत्ता, सच को शूल सलीब|
अमीरी दिखलाये तहजीब||
अमीरी दिखलाये तहजीब|||

Saturday, August 1, 2020

उधर लूटने

आँखों में आंसू नहीं, अंतर में अहसास|
सन्नाटा पसरा हुआ, मरघट लगें निवास||

थमी प्रगति की चाल है, ठग ने नोची खाल|
फिरते खाली हाथ हैं, कई करोड़ों लाल||

उधर लूटने के मिले, अवसर लाखों लाख।
इधर आपदा ने किये, लाखों के घर राख।।

अर्थतंत्र की दुनिया

अर्थतंत्र की इस दुनिया में, सच्चाई को ठौर कहाँ?
राजनीति में जो हैं जैसे, उनसे अच्छे और कहाँ?
शैतानों की मनमानी से,कौन कभी लड़ पाया है,
जिसने किया परास्त विरोधी वो विजयी कहलाया है।
युद्ध भूमि में न्यायनीति पर, योद्धा करते गौर कहाँ?
राजनीति में जो हैं जैसे, उनसे अच्छे और कहाँ?
सत्ता का स्वरूप होता है, शक्तिशालियों की रक्षा,
धर्मराज्य में बराबरी की, कहीं नहीं लगती कक्षा।
जो गरीब की ढके आबरू, ऐसी नैतिक सौर कहाँ?
राजनीति में जो हैं जैसे, उनसे अच्छे और कहाँ?
देखो भी तो लोकतंत्र में,सब कुबेर के अफ़सर हैं,
चलता है आदेश उन्हीं का,वो ही तो परमेश्वर हैं।
जो विधान संगत है उसके, अनुपालन का तौर कहाँ?
राजनीति में जो हैं जैसे, उनसे अच्छे और कहाँ?

बड़के लोग

लाखों भूखे हैं प्यासे हैं,मगर न चोरी करते हैं।
बड़के लोग ग़रीबों से क्यों,सीनाज़ोरी करते हैं?
कमज़ोरों के घास फूस के,डेरे रौंदे जाते हैं।
शैतानों के सत्ता से क्यों,होते रिश्ते-नाते हैं?
दण्डित कभी न वो होते जो,रिश्वतखोरी करते हैं।
बड़के लोग ग़रीबों से क्यों,सीनाज़ोरी करते हैं?
इन्सानों की इस दुनिया में,सब इन्सान बराबर हैं।
फिरभी लुटते पिटते रहते,शोषित दलित सरासर हैं।।
क्यों मिलते अधिकार उन्हें जो,ठगी चिरोरी करते हैं।
बड़के लोग ग़रीबों से क्यों,सीनाज़ोरी करते हैं?
भूमि सभी के लिए बनी है,सबने इसे सजाया है।
मजलूमों ने विपदाओं से,घिरता विश्व बचाया है।।
धरती मोरी तोरी कहके,ठग सहजोरी करते हैं?
बड़के लोग ग़रीबों से क्यों,सीनाज़ोरी करते?

तालाबंदी

जय जय करके दास बन गये।
धन पशुओं की घास बन गये।।

कोरोना से लड़ते - लड़ते ,
बहुत लोग इतिहास बन गये।

दिया आपदा ने अवसर जो,
वो उस कारण ख़ास बन गये।

बाज़ारों को खुली छूट है,
ठग के पाँच पचास बन गये।

इन के गिरे घरौंदे तो फिर,
उनके नये निवास बन गये।

नोटों से तालाबन्दी में,
लाखों फ़र्ज़ी पास बन गये,

देख -देख करके  परपीड़ा,
तुकाराम चौमास बन गये।