Wednesday, August 12, 2020

सत्ता का बाजार

 

सच्चे जन पर दोष लगाया जाता है,
दोषी को निर्दोष बताया जाता है।

सत्ता का बाजार नहीं घाटा देता,
मनमाफिक लाभांश कमाया जाता है।

जिसको गोड़ा और नहीं बोया जाता,
वो पकी फस्ल का खेत कटाया जाता है।

मुर्दों को तो मालपुआ बांटे जाते,
भूखे मुंह से कौर छिनाया जाता है।

मजबूरी की बात नहीं मसलहतन ही,
हत्यारों का साथ निभाया जाता है।

इनके गुण्डे उनके गुण्डे अपने हों,
टिकट दिलाकर उन्हें जिताया जाता है।

राजनीति की नीति यही बेहिचक तुका,
दुश्मन को भी दोस्त बनाया जाता है।

Tuesday, August 11, 2020

काव्य कर्म ने प्रश्न किया

 

काव्य कर्म ने प्रश्न किया हैं, कवि को क्या कहना है|
अनुचर बनकर चलना है, या अगुवा -सा रहना है||
 
कहिये किसके अभिनन्दन के, हेतु फड़कती बाहें,
धार्मिक रूढ़िवादिता अथवा, मानवता की राहें|
निर्णय करिए किस धारा की, ओर किसे बहना है|
अनुचर बनकर चलना है, या अगुवा -सा रहना है||
 
सत्य तथ्य अभिव्यक्ति हेतु जब, सुलभ नहीं आज़ादी,
तो यह कैसे कहें जी रही, मुक्त रूप से खादी|
लोकतंत्र सामंतवाद में, किसका कर गहना है|
अनुचर बनकर चलना है, या अगुवा -सा रहना है||
 
अर्थतंत्र की चाटुकारिता, जिसके स्वर में आई,
उसको कलमकार कहना क्या, समुचित होगा भाई|
वातावरण बदलना है या, जो है वो सहना है|
अनुचर बनकर चलना है, या अगुवा -सा रहना है||

Sunday, August 9, 2020

गीतों की दुनिया--

 

गीतों की दुनिया--
कवि ने जो सीखा है, वो सुनो सुनाता हूँ।
गीतों की दुनिया से, परिचय करवाता हूँ।।
 
परपीर जिसे दिखती, वो आँख सलोनी है।
यह कहना सही नहीं, होनी तो होनी है।।
शिव सुन्दर शब्दों से, सन्सार सजाता हूँ।
गीतों की दुनिया से, परिचय करवाता हूँ।।
 
जो शक्ति मिली उसको, वो पास तुम्हारे है।
सरि नीर उसे देती, जो गया किनारे है।।
सर्जन करने से ही,सर्जक कहलाता हूँ।
गीतों की दुनिया से, परिचय करवाता हूँ।।
 
इस विश्व वाटिका को, हम सबने है सींचा।
इसको सँवारने में,पीछे न हाथ खींचा।।
इसके सद्सुमनों से, जग को महकाता हूँ।
गीतों की दुनिया से,परिचय करवाता हूँ।।
 
अंतिम सांसों तक भी, इन्सान बने रहना।
प्राणवायु जैसा ही, अविरल जग में बहना।।
जो कहता वो करता, सच लिखता गाता हूँ।
गीतों की दुनिया से, परिचय करवाता हूँ।।
 
कवि शब्द विधाता है, मूल्यों का दाता है।
दुनिया भर से उसका, नैसर्गिक नाता है।।
जो सबको तृप्त करे, वो फस्ल उगाता हूँ।
गीतों की दुनिया से, परिचय करवाता हूँ।।

दर्द दिल

 

दर्द दिल का सुनाना पड़ा आज है।
सामने वायरस भी खड़ा आज है।
 
कल रहें या मरें ये किसे है पता,
इसलिए गुनगुनाना पड़ा आज है।
 
सख्त आदेश है जानिए भी इसे,
एक ताला अधर पर जड़ा आज है।
 
मौत की बूँद कब कौन मुँह में गिरे,
छल छलाने लगा विष घड़ा आज है।
 
खौफ में है तुकाराम वो भी यहाँ,
भर चुका स्वर्ण से जो हड़ा आज है।

Saturday, August 8, 2020

 

जिन हाथों ने छीन लिए हैं,जीवन के अधिकार सभी।
गीत कह रहे उन्हें किए हैं,लोग अभी स्वीकार सभी।।
 
कल क्या होगा कौन जनता,आज मौज के मेले हैं।
डालर रुपयों से तो उनके,खेल खेलते चेले हैं।।
शासन करने को गिरफ़्त में,उनके हैं आधार सभी।
गीत कह रहे उन्हें किए हैं,लोग अभी स्वीकार सभी।।
 
क्षुब्ध लोकशाही कहती है,गाँव गरीब रो रहे हैं।
नेताओं के सिवा किसी के,काम न कहीं हो रहे हैं।।
सरकारों पर क़ाबिज़ बैठे,बड़े-बड़े परिवार सभी।
गीत कह रहे उन्हें किए हैं,लोग अभी स्वीकार सभी।।
 
कभी कभी सूखे तिनके भी,आँधी सा बन जाते हैं।
बेगवान तूफ़ान उठे तो,बरगद ठहर न पाते हैं।।
आकस्मिक रोगों में आते,काम कहाँ उपचार सभी।
गीत कह रहे उन्हें किए हैं,लोग अभी स्वीकार सभी।।
 
जादू टोने की होती है,जिनके पास अजीब छड़ी।
झूठ बोलने की हो जाती,दौलत उनके पास बड़ी।।
बाँट दिया करते हैं वो तो,बातों में उपहार सभी।
गीत कह रहे उन्हें किए हैं,लोग अभी स्वीकार सभी।।

Friday, August 7, 2020

ईश्वर की तलाश

 

ईश्वर की तलाश है जिनको, उन्हें मुबारकवाद।
धर्म बेड़ियों से मानव को अब करिए आज़ाद।।
प्यार चाहिए इंसानों को इंसानी व्यवहार,
शांति बढ़ेगी तब जग में जब सभी करें सहकार।
प्रेम प्रसारण हेतु यीशु का, त्याग नहीं क्या याद?
धर्म बेड़ियों से मानव को अब करिए आज़ाद।।
भेदभाव की सीमाओं को अगर न तोड़े लोग,
तो दुनिया से दूर न होंगे द्वेष- घृणा के रोग।
उपयोगी है नमक तभी तक जबतक उसमें स्वाद।
धर्म बेड़ियों से मानव को अब करिए आज़ाद।।
आडम्बर तो आडम्बर है होता सच से दूर,
पत्थर से सिर मारोगे तो होगा चकनाचूर।
बहुत हो चुका और न करिए दुनिया को बर्बाद।
धर्म बेड़ियों से मानव को अब करिए आज़ाद।।

Thursday, August 6, 2020

रक्तदान

हमसे बात करो पर प्यारे!, इन्सानों की बात करो|
जिन यत्नों से प्यार बढ़े, उन अभियानों की बात करो||

धन पशुओं के साथ कभी हम खड़े नहीं हो सकते हैं|
जाग्रत रहते हैं कबीर-सा, कभी नहीं सो सकते हैं||
श्रमिक गंध से भरे हुए शुचि, परिधानों की बात करो|
जिन यत्नों से प्यार बढ़े ,उन अभियानों की बात करो||

मानवता का जहाँ वास है, जहाँ सभी अपने लगते|
जहाँ परार्थ प्रेम पसरा है, जहाँ न जन जन को ठगते||
रक्त दान जो देते हैं उन, दीवानों की बात करो|
जिन यत्नों से प्यार बढ़े, उन अभियानों की बात करो||

जिन्हें राष्ट्र के कण-कण में बस अपना घर दिखता है|
जिनका निष्पृह चिंतन सुन्दर शिवम सत्य लिखता है||
भेद भाव से विलग न्यायप्रिय गुणवानों की बात करो|
जिन यत्नों से प्यार बढ़े, उन अभियानों की बात करो||