Friday, March 30, 2012

लोकतंत्र हुडदंग नहीं है , लोकतंत्र बदरंग नहीं|
लोक व्यवस्था के जीवन में,मान्य बंधुओ! जंग नहीं||

अपने आप सभी को रहना अनुशासित होता है,
नागरिकों से चित्र राष्ट्र का परिभाषित होता है|
देश भक्त वे नहीं कि जिनमें,जन सेवार्थ उमंग नहीं|
लोक व्यवस्था के जीवन में,मान्य बंधुओ! जंग नहीं||

लोकतंत्र में मानवता को आगे लाया जाता,
भेद-भाव को त्याग स्नेह समता स्वर गाया जाता|
वैज्ञानिक चिंतन बढ़ता है,रहता अंतर तंग नहीं|
लोक व्यवस्था के जीवन में,मान्य बंधुओ! जंग नहीं||

सबको लोकहितैषी विधि से निर्णय लेने होते,
नागरिकों के सभी स्वत्व भी,उनको देने होते|
अपने कटु विरोधियों का भी, तज सकते है संग नहीं| 
लोक व्यवस्था के जीवन में,मान्य बंधुओ! जंग नहीं||

Thursday, March 29, 2012

समाज में अशांति है, अपार लूटमार है|
विकास ढोल बज रहे, सुधार है सुधार है||

जिन्हें समाजवाद पर, असीम ऐतवार है|
उन्हीं सुबंधु के यहाँ, स्याह धन अपार है ||
किसी गुनाहगार को, न खौफ़ है विधान का,
सुना गया कि न्यायपालिका पनाहगार है|

महान लोकतंत्र के, महान लोकशाह भी,
जुबान खोलते नहीं, धनेश से करार है|

स्वतंत्र आँख खोलिए, निहारिए विचारिये,
कि क्यों गरीब आदमी, अमीर का शिकार है ?

'तुका' गरीब गाँव पर, प्रकोप है उजाड़ का,
मगर सफेदपोश के, यहाँ सदा बहार है|

Monday, March 26, 2012

कौन यहाँ अत्याचारी हैं,कौन यहाँ व्यभिचारी?
कौन लुटेरों के पोषक हैं,जाने जनता प्यारी?

रूप-रंग तो बदल लिया है,केवल खुद को सबल किया है,
भाषण अविरल विमल दिये है,पर न आचरण धवल जिया है|
अर्थ भारी थैली थामी है,बुद्धि गई सब मारी|
कौन यहाँ अत्याचारी हैं,कौन यहाँ व्यभिचारी?
कौन लुटेरों के पोषक हैं,जाने जनता प्यारी?

नफ़रत को फैलाने वाले,दो के बीस बनाने वाले,
खोटे सिक्कों की ताकत पर,रुतबा यहाँ दिखाने वाले|
क्रूर मिलावट खोर हज़ारों,कहलाते व्यापारी|
कौन यहाँ अत्याचारी हैं,कौन यहाँ व्यभिचारी?
कौन लुटेरों के पोषक हैं,जाने जनता प्यारी?

कई संगठित भ्रष्टाचारी,बन बैठे है धर्म पुजारी,
जन गण मन की अभिलाषा को,रौंद रहे हैं बारी-बारी|
विज्ञापित यूँ किये जा रहे, जैसे हों अवतारी|
कौन यहाँ अत्याचारी हैं,कौन यहाँ व्यभिचारी?
कौन लुटेरों के पोषक हैं,जाने जनता प्यारी?

गान गरीब किसान हमारे,आश्वासन के महज़ सहारे,
पैंसठ वर्ष बीतने पर भी,भूखे-प्यासे हारे-मारे| 
अधिकारी सत्ताधारी भी ,दिखलाते लाचारी|
कौन यहाँ अत्याचारी हैं,कौन यहाँ व्यभिचारी?
कौन लुटेरों के पोषक हैं,जाने जनता प्यारी?
बहुत हो चुकी आयु,अर्थ से क्या लेना देना?
नाव अपने बाजुओं से है स्वतः खेना||

डालियों के छाँटने से कुछ नहीं होगा,
काटना है तो अनय-तरु मूल को काटो,
है असंभव जिन पथों से मंज़िलें पाना -
गर्त गहरे सब वहाँ के देखकर पाटों|
लेखनी रूपी कुदाली थाम ली है तो-
सर्जना के हेतु बनिये चेतना सेना||

कौन कहता चाहने से कुछ नहीं होता,
क्या तिमिर के कोप से दिनमान है हारा?
वो पहाड़ों के ह्रदय को चीर देता है-
जो प्रपातों-सी बहाता स्नेह-जल धारा|
शब्द में तो शक्ति है अणुअस्त्र से ज्यादा-
काव्य रूपी शस्त्र को कुछ सीखिए टेना||

एक दिन संसार नव आकर पायेगा,
भूमि पर भूखा न कोई आदमी होगा,
आज है एलानिया ये घोषणा कवि की-
न्याय देना शासकों को लाजिमी होगा|
लोकशाही इस जहाँ से अब न जायेगी-
और भूखे से सभी को वोट है लेना ||

Sunday, March 25, 2012


चौसठ वर्षों बाद कौन-सी रीति गई हैं शोधी,
भ्रष्टाचार बढ़ाने वाले भ्रष्टाचार विरोधी|
संत बनकर आये,मेह जैसा छाये||

लूट लिया भरपूर राष्ट्र को, मिलकर कई लुटेरों ने,
बाँट लिया है सब कुछ अबतो, चोर-चोर मौसेरों ने|
पोल खोलने वालों को ठग कहते हैं अवरोधी||
चौसठ वर्षों बाद कौन-सी रीति गई हैं शोधी,
भ्रष्टाचार बढ़ाने वाले भ्रष्टाचार विरोधी|
संत बनकर आये,मेह जैसा छाये||

कई पीढ़ियों हेतु भरा हैं,जिनके घर का हर कोना,
उनको भी आ गया देखिये, घड़ियालों जैसा रोना|
धन सेवी के सेवक कहते, जनसेवी हैं क्रोधी||
चौसठ वर्षों बाद कौन-सी रीति गई हैं शोधी,
भ्रष्टाचार बढ़ाने वाले भ्रष्टाचार विरोधी|
संत बनकर आये,मेह जैसा छाये||  

Saturday, March 24, 2012

अस्सी वर्षों के गालों पर युवकों-सी लाली,
लेकिन कई करोड़ों बच्चों की खाली थाली|
यही है जुम्मेदारी,मलाई बारी-बारी||

शिक्षालय में ताले लटके,अस्पताल में रोगी भटके,
सरकारी दफ्तर में जनता,बिजली जैसे खाती झटके|
काले धन ने कर डाली है, सत्ता भी काली|
यही है जुम्मेदारी,मलाई बारी-बारी||

भाषण जितने प्यारे-प्यारे,प्रतिफल उतने खारे-खारे,
मतदाता मत देकर सिसकें,कहें न कुछ उलझन के मारे,
सूख रही है लोकतंत्र के,तरुवर की डाली| 
यही है जुम्मेदारी,मलाई बारी-बारी||

क्रूर व्यवस्था मानो सोती,गाँव गरीब किसानी रोती, 
जो न उठाने से उठता है,उस बोझे को महिला ढोती,
जनप्रतिनिधि दल प्रतिनिधियों-सी,करते रखवाली|
यही है जुम्मेदारी,मलाई बारी-बारी||

Friday, March 23, 2012

लोग जो भी किये हड़बड़ी चौधरी|
वे अधिकतर किये गड़बड़ी चौधरी||

आपके साथ गद्दार वो आ गया,
काल्पनिक बात जिसने जड़ी चौधरी|

वक्त की रौशनी को समझ लीजिये,
छोड़िये जाति की हेकड़ी चौधरी |

पैर उस मार्ग के बीच में मत धरें,
स्वार्थ की भित्ति जिसमें खड़ी चौधरी|

तोप तलवार बेकार उसके लिए,
प्यार की जो लिए है छड़ी चौधरी|

दर्द अपमान का जानता वो नहीं,
मार जिसके न सिर पर पड़ी चौधरी|

भीड़ तो मंत्रियों की दिखावा'तुका'
राज करती सदा चौकड़ी चौधरी |