Friday, May 25, 2012

कहने को बहुत है सोचते रहिये|
कुछ संभावनायें खोजते रहिये||
मुमकिन है आपको मंच मिल जाये,
जो समुचित लगे वो बोलते रहिये|
सच्चाई कभी तो ज्ञात हो सकती,
बस साधक की तरह शोधते रहिये|
यह धरती हरी-भरी रखनी है तो,
प्रिय! कुछ नये पौधे रोपते रहिये|
नायक बन सकते हो शर्त यही है,
सबके सम्मुख हाथ जोड़ते रहिये|
कविता का उद्देश्य यही है दोस्तो!,
मानवता के मूल्य पोषते रहिये|
'तुकाराम' शब्द शक्ति के संबल से,
अनैतिकता को झकझोरते रहिये|

Wednesday, May 23, 2012

देखा-परखा समझा दुख-सुख,कवि ने बहुत करीब से|
जीवन जिया नहीं जा सकता,बहुत अधिक तरतीब से ||
चौथेपन तक आते-आते, विदित हुआ यह तथ्य भी,
जटिल कार्य हल हो सकते हैं,चिंतन की तरकीब से|
जो आँधी -सा चले हमेशा,गरजे -बरसे मेघ -सा 
वह भी बदले-बदले अब तो,दिखते बहुत अजीब से|
बचपन में माँ ने सिखलाया,तदुपरांत गुरुदेव ने,
लेकिन अब तक सीख रहा हूँ,मन को खोल हबीब से|
कुछ ऐसे भी बड़े लोग हैं,जो हम सबको लूटते,
पर कहते फिरते दुनिया में,सब कुछ मिला नसीब से| 
इनको पता नहीं क्या करते,करना इन्हें मुआफ़ भी,
निज बधिकों के हेतु दुआ यह,करते यीशु सलीब से|
जिसे जरूरत हो वह माँगे,उसकी अपनी सोच है,
मगर 'तुका'को नहीं माँगना,कुछ भी कभी हसीब से|

Sunday, May 20, 2012

सच को सच कहने की जिसमें,क्षमता नहीं रही| उसने कुछ भी कहा जानिये,कविता नहीं कही|| प्रिय है जिसको शब्द साधना,वह परमार्थ करे, तृषा बुझाये सकल सृष्टि की,निर्झर भाँति झरे| जिसने जन्मभूमि -सी समझी,नहीं समग्र मही| उसने कुछ भी कहा जानिये,कविता नहीं कही|| धरती के कण-कण को जिसने,माना वसुंधरा , वही विवेकी भाव- सिंधु में,उतर सका गहरा| जिये कूप के मेढक-सा जो,बात करे सतही| उसने कुछ भी कहा जानिये,कविता नहीं कही|| कवि के एक-एक अक्षर से,चेतन शक्ति जगे, जन जीवन के लिए ह्रदय में,शुचि अनुरक्ति पगे| निष्पृह हो अभिव्यक्ति न जिसकी,तो फिर कहो यही| उसने कुछ भी कहा जानिये,कविता नहीं कही|| सब के दुख को,निज दुख जैसा,जो कि नहीं समझा, वह कितना महान हो फिरभी,रहा भ्रमित उलझा | पर सुख देख न जिसको सुख हो,तो यह उक्ति सही| उसने कुछ भी कहा जानिये,कविता नहीं कही||

सच को सच कहने की जिसमें,क्षमता नहीं रही|
उसने कुछ भी कहा जानिये,कविता नहीं कही||

प्रिय है जिसको शब्द साधना,वह परमार्थ करे,
तृषा बुझाये सकल सृष्टि की,निर्झर भाँति झरे|
जिसने जन्मभूमि -सी समझी,नहीं समग्र मही|
उसने कुछ भी कहा जानिये,कविता नहीं कही||

धरती के कण-कण को जिसने,माना वसुंधरा ,
वही विवेकी भाव- सिंधु में,उतर सका गहरा| 
जिये कूप के मेढक-सा जो,बात करे सतही|
उसने कुछ भी कहा जानिये,कविता नहीं कही||

कवि के एक-एक अक्षर से,चेतन शक्ति जगे,
जन जीवन के लिए ह्रदय में,शुचि अनुरक्ति पगे|
निष्पृह हो अभिव्यक्ति न जिसकी,तो फिर कहो यही|
उसने कुछ भी कहा जानिये,कविता नहीं कही||

सब के दुख को,निज दुख जैसा,जो कि नहीं समझा,
वह कितना महान हो फिरभी,रहा भ्रमित उलझा | 
पर सुख देख न जिसको सुख हो,तो यह उक्ति सही|
उसने कुछ भी कहा जानिये,कविता नहीं कही||

Saturday, May 19, 2012

चेतना जो सुप्त कर दे गीत वह कैसा ?
स्नेह स्वर से जो विलग संगीत वह कैसा?

जो प्रकृति की भावना को छोड़ दे,
जो ह्रदय को वासना से जोड़ दे ,
कौन उसके कथ्य को स्वीकार ले-
जो प्रगति की धार का रुख मोड़ दे|
स्वार्थ की दुर्गन्ध जिसमें दूर से आये,
प्यार का अभिनय करे जो मीत वह कैसा?
स्नेह स्वर से जो विलग संगीत वह कैसा?

जो अपरिचित जी रहा हो अक्ष्य से,
और भटका सर्वथा हो लक्ष्य से,
वह किसी को क्या शरण देगा भला-
माँगता आवास जो हो रक्ष्य से|
शक्ति के आगे स्वयं जो हाथ फैलाये-
शोषकों की नीति के विपरीत वह कैसा? 
स्नेह स्वर से जो विलग संगीत वह कैसा?

जो खड़ा हो साधकों के साथ में,
मोह का खंजर छिपा के हाथ में,
बात है यह सत्य उसको सर्वदा-
शूल ही अगणित मिलेंगे पाठ में|
जो कि सन्यासी अवस्था में पहुँच कर भी-
लालसा छोड़े न जो जगजीत वह कैसा? 
स्नेह स्वर से जो विलग संगीत वह कैसा?

Friday, May 18, 2012

आत्मतोष के हेतु परिश्रम, करते हैं भरपूर,
हमेशा कर्मवीर मजदूर|
हमेशा कर्मवीर मजदूर||

श्रमिक-शक्ति शाश्वत कल्याणी,श्रमिकों को प्रिय है जग प्राणी,
श्रम ने समझी सदा सुनायी, मानवीय गरिमा की वाणी|
फिर भी विविध अभाव झेलते,श्रमसेवी मजबूर,
हमेशा कर्मवीर मजदूर|
हमेशा कर्मवीर मजदूर||

श्रम की त्यों सम्प्रभा निराली,सुख देती है ज्यों हरियाली,
श्रमिक वर्ग ने सकल सृष्टि की,युग प्रबोध तस्वीर सँभाली|
आदिकाल से सर्जनात्मक,श्रमिकों के दस्तूर,
हमेशा कर्मवीर मजदूर|
हमेशा कर्मवीर मजदूर||

प्रगति मूल हैं श्रमिक हमारे,यों उज्ज्वल ज्यों नभ के तारे,
प्रकृति गवाही स्वतः दे रही,श्रम से स्वर्णिम साँझ-सकारे|
श्रमिक दूर यों करें दर्प ज्यों,पाल में उड़े कपूर|
हमेशा कर्मवीर मजदूर|
हमेशा कर्मवीर मजदूर||

Thursday, May 17, 2012

मानवता से विरत शब्द तू, नहीं किसी से बोल,
ह्रदय के बंद विलोचन खोल| 
ह्रदय के बंद विलोचन खोल||

परख ले वर्तमान के गीत,
समझ ले नैसर्गिक संगीत|
सत्य-तथ्य अनुभूति हेतु,निज मन की नब्ज टटोल,
ह्रदय के बंद विलोचन खोल| 
ह्रदय के बंद विलोचन खोल||

लक्ष्य के पथ को भी पहचान,
फिर उन्हें जन उपयोगी मान|
शब्द-शक्ति से सिक्त शिवम शुचि,स्नेह सुधारस घोल,
ह्रदय के बंद विलोचन खोल| 
ह्रदय के बंद विलोचन खोल|| 

पाल मत भेदभाव के रोग,
जन्म है मात्र एक संयोग|
हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई का,बजा रहा क्यों ढोल?
ह्रदय के बंद विलोचन खोल| 
ह्रदय के बंद विलोचन खोल|| 

नाम लो उसके भले अनेक,
किन्तु जग परमेश्वर है एक|
सबने जबरन ओढ़ लिए हैं,सांप्रदायिक चोल,
ह्रदय के बंद विलोचन खोल| 
ह्रदय के बंद विलोचन खोल||

Tuesday, May 15, 2012

सुना दो गीत कवि ऐसा,क्षितिज तक शोर हो जाये|
ज़माना त्याग दे तन्द्रा,सुनहरा भोर हो जाये||

जहाँ इन्सान भूखा है,ह्रदय का खेत सूखा है|
जहाँ अनुरक्ति का अक्षर,मिला हरवक्त रूखा है||
वहाँ सहयोग घन बनकर, बरसिये रात-दिन इतना-
अनैतिक शक्तियों का स्वर,स्वतः कमजोर हो जाये| 
ज़माना त्याग दे तन्द्रा,सुनहरा भोर हो जाये||

जहाँ पर लूट घोटाले, जहाँ धंधे चलें काले|
जहाँ पर स्वार्थी मन ने,लगाये नीति पर ताले||
वहाँ साहित्य संबल से,प्रबोधन कीजिये इतना-
घृणा की ओर जो है वो,प्रणय की ओर हो जाये|
ज़माना त्याग दे तन्द्रा,सुनहरा भोर हो जाये||

सहा करते अनय को जो,नहीं समझे समय को जो|
मृगों की भाँति जीवन भर,भुला पाये न भय को जो||
फजायें चाहती उनकी, रगों का रक्त खौला दो-
सर्प क दर्प दलने को,कबूतर मोर हो जाये |
ज़माना त्याग दे तन्द्रा,सुनहरा भोर हो जाये||