Tuesday, July 17, 2012

क्या होता है काव्य कर्म कवि कैसे बनते हैं|
जिनको हैं यह बोध कभी वे नहीं बहकते हैं||

जिसको जितनी सुवुधाओं के बीच गया पाला,
उतना वे अभाव में निज छाया से डरते हैं|

शीतल जल का दान मेघ नव जीवनार्थ देते,
लेकिन कभी-कभी उनसे भी उपल बरसते हैं|

जिनसे एक बूंद भी जल की कभी नहीं मिलती,
ऐसे बादल सिर पर आकर बहुत गरजते हैं|

उन्हें भला इन्सान कहें तो कहो मित्र कैसे,
पर पीड़ा को देख न जिनके अश्रु निकलते हैं|

जिनकी सत्ता से नजदीकी होती है जितनी,
जनता से वे  अक्सर उतनी दूरी रखते हैं|

शूलों में रह जो फूलों जैसा पलते खिलते,
'तुकराम' वे सकल सृष्टि में सदा महकते हैं|

Sunday, July 15, 2012

सिर्फ उपदेश हैं स्वार्थ व्यापार हैं|
धर्म के नाम पर क्रूर व्यवहार हैं||

पाप से दूर हम पापियों के सभी,
पाप को मेटने में मददगार हैं |

नफरतों से भरे अर्थ के दौर में,
खोलते जा रहे प्यार के द्वार हैं|

मत डराओ प्रिये!अब किसी खौफ़ से,
मौत के हेतु हर वक्त तैयार हैं|

कौन आतंकियों का करे सामना,
धर्म के तंत्र से राज्य लाचार हैं|

आधुनिक ज़िन्दगी की चकाचौंध में,
टूटते जा रहे गेह परिवार हैं |

आज भी देखिये तो 'तुका' के बने,
एक दो शत्रु पर मित्र दो चार हैं |

Saturday, July 14, 2012

नयी रौशनी मित्र गाँवों शहर में|
प्रगती देखनी मित्र गाँवों शहर में||

बजह कौन-सी है पता कुछ करें क्यों,
गयी शेरनी मित्र गाँवों शहर में|

न खुद से किसी ने पूछा किसे अब,
ठगी सीखनी मित्र गाँवों शहर में|

नये दौर में भी उपेक्षित रही क्यों,
यहाँ भीलनी मित्र गाँवों शहर में|

सभी भोग जिसका करें स्नेह से वो,
फसल रोपनी मित्र गाँवों शहर में|

कहो कौन-सा आज तूफ़ान आया,
थमी लेखनी मित्र गाँवों शहर में|

पढ़ाई 'तुका' जा रही आज भी क्यों,
घृणित जीवनी मित्र गाँवों शहर में?

वह है चतुर महान यहाँ कवियों जैसा|
पहने है परिधान यहाँ कवियों जैसा||

कविता का व्यवहार न जिसको ज्ञात उसे 
मिलता है सम्मान यहाँ कवियों जैसा|

भ्रष्टाचार विरोधी दल का जगह-जगह,
शुरू हुआ अभियान यहाँ कवियों जैसा|

घुस न सकेगा अरि दल भारत सीमा में,
उनका है एलान यहाँ कवियों जैसा|

चोर बकैत लठैत नहीं अब दिखें कहीं,
हर कोई गुणवान यहाँ कवियों जैसा| 

सुलभ उन्हें सब कुछ सत्ता के आँगन में,
पर मिला नहीं ईमान यहाँ कवियों जैसा|

'तुका' यही है सत्य सत्य है सत्य यही,
कौन हुआ कुर्वान यहाँ कवियों जैसा?
इधर से उधर से उठाकर लिखा हँ|
समझिये न चोरी बताकर लिखा है||

नयी रौशनी की नयी गीतिका को,
नियम ज़िन्दगी के निभाकर लिखा है|

सभी को हँसाना जिन्हें है सुहाया, 
उन्होंने हंसी को छिपाकर लिखा है|

मुहब्बत किसी को कहाँ चैन देती,
महबूब का दिल दुखाकर लिखा है| 

तुकाराम जैसा मिला नाम जिनको,
उन्होंने स्वयं को रुलाकर लिखा है|

Friday, July 13, 2012

स्वानुभूति कहने से पहले सत्यासत पहचानिये|
वक्त चाहता है कवियों से युग-आहत पहचानिये||

सोच-समझ की तर्क शक्ति से सर्जनात्मक बोध बढ़े,
काव्य-शिखर से बहती रसमय शिव ताकत पहचानिये|

क्या बटोरना यूरो -डालर स्वर्ण-रजत जग सम्पदा ,
चोर न जिसको चुरा सकें वो गुण-दौलत पहचानिये|

आदिकाल से पैर जकड़कर कैद किये जंजाल में,
मुक्त कर सके जो जीवन को वो हिकमत पहचानिये|

कौन जोड़-तोडों से मिलती कौन ईश वरदान से,
दान प्राप्त करने से पहले हर बरकत पहचानिये|

मान मर्तबा इंसानों -सा विश्व बीच मिल जायेगा,
उग्रवाद का शमन करे जो वो आदत पहचानिये |

एक वृक्ष के पत्तों जैसा जग मानव का वंश है,
नम्रभाव से 'तुका' कह रहा नव भारत पहचानिये|

Wednesday, July 11, 2012

हमने देखी बड़े-बड़ों के,उर की वह तस्वीर|
न जिसमें परहित किंचित पीर|| 
न जिसमें परहित किंचित पीर|||

कई मील से जिन भवनों की, सूरत दिखे चमकती|
उनके अंदर मानवता की, चाह न अल्प झलकती||
अपने और परायेपन की, वे तो बने नजीर| 
न जिसमें परहित किंचित पीर|| 
न जिसमें परहित किंचित पीर|||

जितना भारत का आँगन है, प्रिय उदार मधुमासी|
उतना इसके निवासियों का, जीवन भोग विलासी||
अनाचार ने अर्जित की है,वह कुत्सित जागीर| 
न जिसमें परहित किंचित पीर|| 
न जिसमें परहित किंचित पीर||| 

लोकतंत्रीय जीवन पद्धिति, इनको नहीं सुहाती|
संविधान के परिपालन में, इनकी फटती छाती||
कदाचार ने पहनाया है, ऐसा ठगुआ चीर|
न जिसमें परहित किंचित पीर||
न जिसमें परहित किंचित पीर|||